परिचय

कृष्ण कुमार मिश्र, जिन्हें सब श्याम साधु कहते हैं

जन्म 2 जून 1939 को हुआ। उसके बाद के अधिकांश वर्ष उन्होंने उन जानवरों को खिलाने, उनका इलाज कराने और उनका अंतिम संस्कार करने में बिताए हैं जिन्हें कोई और अपनाने को तैयार नहीं था। यह उनका जीवन है, जैसा उनकी अपनी साइट बताती है।

श्याम साधु एक बछड़े को गोद में लिए हुए, अपने विशिष्ट नारंगी वस्त्र में।
शुरुआती वर्ष

वाराणसी का वह बच्चा जो जानवरों के लिए रोटी ले जाता था

उनका जन्म ब्रिटिश भारत में, तत्कालीन बिहार (आज झारखंड) के हज़ारीबाग़ ज़िले के बेरमो में हुआ। उनके पिता, श्री बल भद्र शरण मिश्र, हज़ारीबाग़ पुलिस विभाग में निरीक्षक थे।

आठ साल की उम्र तक वे वाराणसी में अपने मामा के घर रह रहे थे, और वहीं से यह आदत शुरू हुई। वे स्वयं बताते हैं कि वे रसोई से चोरी-छिपे रोटियाँ लाकर बाहर जानवरों को खिलाया करते थे। किशोरावस्था तक यह आदत नहीं, उनका काम बन चुकी थी।

अब कई वर्षों से वे रायबरेली, उत्तर प्रदेश में रहते हैं। जो चुराई हुई रोटियों से शुरू हुआ था, उसमें आज उनका परिवार भी साथ है और वे लोग भी जो उनसे कभी मिले नहीं।

रायबरेली में ज़मीन पर बैठे श्याम साधु, अपने चारों ओर इकट्ठा बंदरों को खिलाते हुए।
वानरभोज

वे बंदरों को खिलाने को हनुमान जी की सेवा क्यों कहते हैं

उनका तर्क सीधा है, और वे उसे बार-बार दोहराते हैं। मनुष्यों ने हनुमान जी के वानर स्वरूप को देखकर ही उनकी प्रतिमाएँ बनाईं। आज हम उन्हीं प्रतिमाओं पर श्रद्धा से भोग अर्पित करते हैं, और जीवित वानरों की सेवा से मुख मोड़ लेते हैं। वानरभोज इसी विडंबना का उत्तर है।

वे निगोहा के पास भँवरे सुरान गाँव नियमित रूप से जाते हैं, जहाँ वे बंदरों को भोजन कराते हैं और ज़रूरतमंद बच्चों की भी मदद करते हैं। रोटियाँ, चना और जो कुछ मिल सके, वे इकट्ठा करते हैं और मौसम की परवाह किए बिना निकल पड़ते हैं।

वे यह भी मानते हैं कि शुरुआत में डर था — कहीं बंदर काट न लें। ऐसा नहीं हुआ। धीरे-धीरे वे उनके परिवार बन गए, और बंदर उनके।

रायबरेली में वानरभोज के दौरान दर्जनों बंदर श्याम साधु के चारों ओर इकट्ठा।
हर जीव

वे जानवरों में चुनाव नहीं करते

उन्हें अनाथ जानवरों का ‘मसीहा’ कहा जाता है, क्योंकि वे उनमें कोई भेद नहीं करते — साँप हो, गाय हो, गधा हो, पक्षी हो या सूअर। जो भी घायल या बेसहारा मिले, वे उसे घर ले आते हैं और इलाज कराते हैं।

जब अस्पतालों में जगह नहीं होती, जानवर उनके घर पर ही रहते हैं; उन्होंने घर में उनके लिए एक अलग वार्ड बनाया है। साँपों को बचाकर जंगल में छोड़ने के लिए भी वे जाने जाते हैं।

और यदि कोई जानवर नहीं बचता, तो वे पूरे विधि-विधान से उसका अंतिम संस्कार करते हैं। अपने घर के परिसर को ही उन्होंने उनका समाधि स्थल बना दिया है, जहाँ कई जीव दफ़्न हैं। उनका मानना है कि हर जीव के जीवन का सम्मान करना ही सच्ची मानवता है।

श्याम साधु और एक सहयोगी बाहर एक घायल गधे की देखभाल करते हुए।
गीतांजलि हर्बल गार्डन

देसी और विदेशी पौधे, वहाँ उगाए गए जहाँ उगते नहीं

वे केवल पशु-प्रेमी नहीं, पर्यावरण के लिए काम करने वाले व्यक्ति भी हैं। वे कई वृक्षारोपण अभियानों में हिस्सा ले चुके हैं और लोगों को पौधे लगाने के लिए समझाने और सिखाने में समय देते हैं।

अपने घर पर वे ‘गीतांजलि हर्बल गार्डन’ नाम का बगीचा संभालते हैं, जिसमें देसी और विदेशी पौधों का संग्रह है। अनुकूल परिस्थितियाँ बनाकर उन्होंने उत्तर भारत में नारियल, मिनी लीची, काले अंगूर, सिंगापुर स्टार फ्रूट, अंजीर और लौंग तक उगा लिए हैं।

उनका सपना है कि हर घर में एक छोटा-सा बगीचा हो।

श्याम साधु अपने बगीचे में नारंगी वस्त्रों में खड़े हुए।

वानरों की सेवा करना ही स्वयं हनुमान जी की सेवा है।

श्याम साधु, उन्हीं के शब्दों में

यह आगे भी पहुँचा

ये संस्कार उनके परिवार तक भी पहुँचे। उनकी दोनों बेटियाँ और उनके परिवार भी जानवरों की मदद में लगे हैं — चैनल पर ऐसे वीडियो हैं जिनमें उनकी बेटी और नाती स्वयं जानवरों की देखभाल करते दिखते हैं।

परिचय

काम खुद देखिए

उनके आधिकारिक चैनल की छत्तीस फ़िल्में, पूरे वृत्तचित्र सहित।

इस पेज की सारी जानकारी श्याम साधु की अपनी वेबसाइट और चैनल से ली गई है।